संवाददाता – सुनील खोडे
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पेटलावद। पाटीदार पैथोलॉजी लैब विवाद अब केवल दो ब्लड रिपोर्टों तक सीमित नहीं रह गया है। सरपंच पिंटू सिंह भूरिया की शिकायत के बाद शुरू हुआ मामला अब पैथोलॉजी संचालन व्यवस्था, रिपोर्ट सत्यापन प्रक्रिया, विशेषज्ञ डॉक्टरों की भूमिका और जांच प्रणाली तक पहुंच गया है। स्वास्थ्य विभाग की गठित जांच टीम अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट संबंधित सीबीएमओ को सौंप चुकी है और अब पूरे क्षेत्र की नजर इस बात पर टिकी है कि आखिर विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करता है।
रिपोर्ट विवाद से शुरू हुआ मामला, अब व्यवस्था पर सवाल –
सरपंच पिंटू सिंह भूरिया ने आरोप लगाया था कि उनकी दो ब्लड रिपोर्टों में 24 घंटे के भीतर बड़े बदलाव दिखाई दिए, जबकि उन्हीं रिपोर्टों के आधार पर उनका उपचार चल रहा था। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच दल गठित किया और लैब में पहुंचकर दस्तावेजों एवं जांच प्रक्रिया का निरीक्षण किया। अब जांच पूरी हो चुकी है और रिपोर्ट सीबीएमओ कार्यालय को सौंप दी गई है। हालांकि अभी तक विभागीय कार्रवाई सार्वजनिक नहीं हुई है।
आखिर कौन हैं डॉ. आर.के. तिवारी?
मामले में एक बड़ा सवाल रिपोर्टों पर अंकित डॉ. आर.के. तिवारी के नाम और उनकी भूमिका को लेकर भी उठ रहा है। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि संबंधित विशेषज्ञ का लैब से क्या अनुबंध है, वे किस प्रकार रिपोर्टों का सत्यापन करते हैं और क्या प्रत्येक रिपोर्ट की वास्तविक समीक्षा उनके द्वारा की जाती है या नहीं। हालांकि इन सवालों पर अब तक संबंधित पक्ष की ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। ऐसे में आमजन यह जानना चाहते हैं कि रिपोर्टों पर अंकित विशेषज्ञ की जिम्मेदारी और जवाबदेही की प्रक्रिया क्या है। अगर सिर्फ हस्ताक्षर मात्र से रिपोर्ट सही साबित की जा रही है तो ऐसे डॉक्टर ओर पैथोलॉजी लेब पर भी कार्यवाई आवश्यक है।
सिर्फ अनुबंध या वास्तव में होती है रिपोर्ट की पड़ताल?
मामला आमजन के स्वास्थ्य से जुड़ा है ऐसे में पैथोलॉजी लैब में विशेषज्ञ डॉक्टर का नाम केवल औपचारिकता नहीं होना चाहिए, बल्कि रिपोर्टों की गुणवत्ता, सत्यापन और चिकित्सकीय निगरानी भी सुनिश्चित होना चाहिए। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सभी रिपोर्टों का विधिवत परीक्षण किया जाता है अथवा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत अनुमोदन किया जाता है। इस विषय पर भी गहन जांच की आवश्यकता है।
X-Ray, सोनोग्राफी और पैथोलॉजी सेवाओं पर भी उठे सवाल
चौराहों पर अब यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि यदि ब्लड रिपोर्ट को लेकर विवाद सामने आया है तो क्या अन्य जांच सेवाओं जैसे X-Ray, सोनोग्राफी और अन्य पैथोलॉजी परीक्षणों में भी सभी निर्धारित मानकों एवं विशेषज्ञ निगरानी का पालन किया जा रहा है। हालांकि सरपंच ने शिकायत में पाटीदार पैथोलॉजी लेब पर संचालित सभी परीक्षण सेवाओं की जांच की मांग की थी।
लैब संचालक के दो बयान बने चर्चा का विषय
पूरे विवाद में सबसे अधिक चर्चा लैब संचालक नीलेश पाटीदार के दो अलग-अलग बयानों को लेकर हो रही है। वॉइस ऑफ झाबुआ प्रतिनिधि से दूरभाष पर हुई बातचीत में लैब संचालक ने रूप से कहा था कि “मरीज ने दूसरे हाथ से ब्लड लेने के लिए मजबूर किया, इसी वजह से रिपोर्ट में त्रुटि आई।” वहीं बाद में एक मीडिया संस्थान को दिए गए बयान में उन्होंने अलग पक्ष रखते हुए कहा कि रिपोर्ट पूरी तरह सही थी और मरीज के लगातार उपचार के कारण रिपोर्ट में परिवर्तन हुआ है। साथ ही उन्होंने सरपंच द्वारा लगाए गए आरोपों को भी गलत बताया। अब इन दोनों बयानों को लेकर क्षेत्र में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। अलग-अलग बयान किस ओर संकेत दे रहे है।
आदिवासी क्षेत्र में भरोसे का सवाल
पेटलावद आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है, जहां बड़ी संख्या में गरीब और ग्रामीण नागरिक निजी पैथोलॉजी लैबों पर भरोसा कर जांच करवाते हैं। ऐसे में यह विवाद अब केवल एक मरीज की रिपोर्ट का नहीं बल्कि आमजन के स्वास्थ्य, विश्वास और चिकित्सा व्यवस्था की पारदर्शिता का विषय बन चुका है। साथ स्वास्थ्य विभाग की जांच पूरी हो चुकी है और रिपोर्ट संबंधित अधिकारियों को सौंपी जा चुकी है। अब क्षेत्रवासियों को विभागीय कार्रवाई का इंतजार है।
उधर सरपंच पिंटू सिंह भूरिया पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि यदि जांच निष्पक्ष नहीं हुई या दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो वे कलेक्टर, संभागायुक्त और स्वास्थ्य मंत्री तक शिकायत करेंगे तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाएंगे। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट में क्या सामने आया है और क्या यह मामला केवल चर्चा तक सीमित रहेगा या फिर वास्तव में कोई ठोस प्रशासनिक कार्रवाई भी देखने को मिलेगी।