विनय पंचाल, पिटोल।
देशभर में होली के रंग फीके पड़ते ही झाबुआ के आदिवासी अंचल में आस्था की एक अनोखी परंपरा जीवंत हो उठती है। धुलेंडी के दिन भील समुदाय सदियों पुरानी गल परंपरा का निर्वाह करता है। इस परंपरा के तहत मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु 20 से 30 फीट ऊंचे खंभे से बंधकर हवा में परिक्रमा करते हैं।.गांव के किसी प्रमुख स्थान पर एक ऊंचा लकड़ी का खंभा स्थापित किया जाता है। खंभे के नीचे विधि-विधान से पूजन-पाठ किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इसी स्थान को “गल” कहा जाता है और यहां गल देवता की पूजा की जाती है। श्रद्धालु पहले पूजा-अर्चना कर देवता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं, इसके बाद अनुष्ठान की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। खंभे के शीर्ष पर आड़ी लकड़ी या बांस बांधा जाता है। जिस व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होती है, वह “मन्नतधारी” कहलाता है—स्थानीय बोली में उसे “लाड़ा” कहा जाता है। रस्सियों और कपड़ों की सहायता से लाड़ा को सुरक्षित रूप से उल्टा लटकाकर बांधा जाता है। नीचे खड़े लोग संरचना को घुमाते हैं, जिससे लाड़ा लगभग 30 फीट की ऊंचाई पर हवा में गोल-गोल परिक्रमा करता है। उल्टे लटककर किया जाने वाला यह अनुष्ठान पूरे गांव के लिए आस्था, साहस और वचन-पालन का चरम दृश्य बन जाता है।

मन्नत और बलि की परंपरा
आदिवासी समाज में गल देवता से संतान प्राप्ति, परिवार के स्वास्थ्य, बीमारी से मुक्ति, जमीन-जायदाद के विवाद या अन्य कठिनाइयों से राहत के लिए मन्नत ली जाती है। श्रद्धालु संकल्प लेते हैं कि इच्छा पूर्ण होने पर वे गल पर घूमकर सार्वजनिक रूप से देवता का आभार व्यक्त करेंगे। परंपरा के अनुसार प्रत्येक मन्नतधारी अपने साथ एक बकरा लेकर आता है। गल परिक्रमा पूर्ण होने के बाद बकरे की बलि दी जाती है, जिसे मन्नत-पूर्ति और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है।
भगोरिया से गल तक: सात दिन की साधना
गल अनुष्ठान की तैयारी होली से एक सप्ताह पूर्व प्रारंभ होती है। इसी दौरान झाबुआ जिले में पारंपरिक भगोरिया मेले आयोजित होते हैं। कई मन्नतधारी इन सात दिनों में विभिन्न भगोरिया मेलों में शामिल होते हैं और व्रत व अनुशासन का पालन करते हैं। इसे उनकी आध्यात्मिक साधना का हिस्सा माना जाता है। इन सात दिनों के दौरान मन्नतधारी एक समय भोजन करते हैं, शरीर पर हल्दी का लेप लगाते हैं, लाल वस्त्र और पगड़ी धारण करते हैं तथा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए धार्मिक अनुशासन का कड़ाई से निर्वाह करते हैं। धुलेंडी के दिन उन्हें दूल्हे की तरह हल्दी लगाई जाती है।

ढोल-मांदल की थाप और मेले का उत्सव
अनुष्ठान के दिन लाड़ा परिवारजनों और इष्ट-मित्रों के साथ जुलूस के रूप में गल स्थल तक पहुंचता है। ढोल-मांदल की थाप, नृत्य और जयकारों के बीच पूरा वातावरण उत्सव में बदल जाता है।
पिटोल क्षेत्र इस परंपरा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है, जहां दो दर्जन से अधिक आसपास के छोटे-बड़े गांवों के लोग एक स्थान पर एकत्रित होते हैं। इस अवसर पर मेले जैसा दृश्य बन जाता है—दुकानें सजती हैं, झूले और चकरी लगती हैं, और बड़ी संख्या में लोग इस अनुष्ठान को देखने के लिए पहुंचते हैं। झाबुआ के आदिवासी समाज के लिए गल केवल एक रस्म नहीं—यह परंपरा, पहचान और सामुदायिक विश्वास का जीवंत प्रतीक है। धुलेंडी के दिन जब ‘लाड़ा’ 30 फीट ऊपर उल्टा लटककर हवा में परिक्रमा करता है, तब आस्था सचमुच आसमान को छूती दिखाई देती है।