सहायक आयुक्त के संरक्षण में अधीक्षकों की बल्ले बल्ले…!

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@वाॅइस   ऑफ   झाबुआ       @निकलेश  डामोर

जनजाति कार्य विभाग के अंर्तगत आने वाले छात्रावासों के अधीक्षकों की सहायक आयुक्त प्रशांत आर्य के कार्यकाल में बल्ले बल्ले हो रही है… क्योंकि साहब के सरंक्षण में ही ये बच्चों के खाने से लेकर सामग्री क्रय करने तक में ये हेराफेरी करने में कोई कसर नही छोडते है…सुत्रों का तो यह भी कहना है साहब भी इसलिए कुछ नही कहते है क्योंकि साहब के रिश्तेदार ही छात्रावासों में सप्लाय करते है और साहब को हर खेल का अच्छा कमीशन मिल जाता है।जनचर्चा है कि जिले भर के छात्रावासों की स्थिति काफी दयनीय है यहां बच्चों के मुंह से निवाला छिनने वाले अधीक्षकों के बंगले तैयार हो गए है चार पहियां वाहनों हो गए है वो भी शासन द्वारा बच्चों के लिए जो राशि आवंटित की जाती है उससे। अगर इनके घरों का निरिक्षण हो जो आधे से ज्यादा छात्रावासों का सामना इनके घरों में मिलेगा। यहां तक की जो बच्चों के लिए राशन और तरकारी आती है वो भी इनके घरों तक जाती है। ऐसे में बच्चों को जो गुणवत्ता वाला भोजन मिलना चाहिए वो नही मिल पाता है। अगर इनके कुछ दस्तावेजों की ही जांच हो जाये तो दुध का दुध और पानी का पानी हो जायेगा।नियमानुसार अधीक्षकों की नियुक्ति छात्रावासों में 3 वर्ष के लिए होती है मगर कई ऐसे छात्रावास है जिनमें अधीक्षक 3 वर्ष पूर्ण होने के बाद भी काबिज है जो छात्रावास को अपनी बपौती समझते है। जिला प्रशासन को इस ओर ध्यान देते हुए छात्रावास अधीक्षकों के तबादले करना नितांत आवष्यक है। जिससे ये बच्चों के मुंह से निवाला न छिन सके।सुत्रों का तो यह भी कहना है कि कई बालिका छात्रावासों में अधीक्षिका तो रहती नही है मगर उनके पति जरूर रहते है जो छात्रावास में रह कर शराब पार्टी भी करते है। वहीं सुत्रों का यह भी कहना है बच्चें तो ठिक यहां उनकी सुरक्षा के लिए रखे गए ये सरकारी मुलाजिंम प्रेम की गाथाएं लिख रहे है और छोटी मोटी प्रेम कहानियां नही बडी बडी प्रेम कहानियां लिख रहे है वो भी शादी शुदा होने के बावजुद। ऐसे में बच्चों के उपर क्या असर पडेगा ये तो ये ही समझे। प्रेमी छात्रावासों में कोई रात को प्रेम कहानी लिखने जाता है तो कोई दिन में…अब सोचों साहब क्या शिक्षा देते होंगे ये सरकारी मुलाजिंम….बाकि अगले अंक में…….

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