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खाकी की धौंस पर लिया माल, अब भुगतान करने का नाम नही ले रहे वर्दीधारी ? ? ? पेसा मांगा तो व्यापार करना मुश्किल हो जाऐगा ? ? ?

खाकी की धौंस पर लिया माल, अब भुगतान करने का नाम नही ले रहे वर्दीधारी ? ? ?

पेसा मांगा तो व्यापार करना मुश्किल हो जाऐगा ? ? ?

कल्याणपुरा

कहते पुलिस की दोस्ती अच्छी ना दुष्मनी। कानून के रखवाले कानून के दुरूपयोग पर उतारू हो जाए तो अच्छे अच्छो की हवा पानी खराब कर देते है। जिले के इतिहास में कई ऐसी घटनाएं है जिसमें सामान्य व्यक्ति पुलिस से प्रताड़ित हो न्यायालयों की खाक छानने को मजबूर होता अथवा मार खाने के बाद भी दर-दर की ठोकरे खाता। कुछ ऐसी ही आबो हवा इन दिनों कल्याणपुरा की दिखाई दे रही है।

बताते है कल्याणपुरा थाने का कोई पुलिसकर्मी लगभग छः माह पूर्व नगर के बड़े निर्माण सामग्री विक्रेताओं के पास पहुंचा था और थाना परिसर की सीमा सुरक्षित करने हेतु निर्माण सामग्री भिजवाने का आदेष दे आया। व्यापारी बेचारे उन्हे कल्याणपुरा ही रहकर व्यापार करने की मजबूरी थी, सो साहब के आदेष का पालन करते हुए लाखो का माल थाना परिसर में भिजवा दिया। जानकारी तो यह भी है कि तत्समय व्यापारियों को भुगतान की राषि न मांगने संबंधी हिदायत भी मिल गई थी कि यदि भुगतान मांगने की हिम्मत की तो राषन-पानी भी बंद करा देंगे। बेचारे व्यापारी बेठे बिठाए लाखो रूपये दिनदहाड़े ठगा गए। और तो और किसी के सामने मुंह खोलने के भी नही रहे। इस संबंध में व्यापारियों से चर्चा करना चाही तो घबरा गए किंतु व्यापारियों से जुड़े लोगो ने बताया कि साहब का आदेष था तो निर्माण सामग्री भिजवाना पड़ी। भुगतान आस तो व्यापारी लगाए बैठे है किंतु उम्मीद की किरण नजर नही आ रही है। भुगतान मांगने की हिम्मत भी व्यापारियों में नही है, यदि किसी ने मांगा तो व्यापार करना भी मुष्किल हो जाएगा। ग्राम में चर्चा तो यह भी है कि कानून के रक्षक ही यदि भक्षक बन बैठे तो थाना क्षैत्र राम भरोसे ही हो जाएगा। जिनसे मदद की उम्मीद लगाई जाती है उन्ही लोगो ने दिन दहाड़े दादागिरी से माल ऐठ लिया।
खाकी ढूंढती दाव
ग्राम में चल रही चर्चा की माने तो थाना पर पदस्थ एक पुलिसकर्मी सिर्फ जुगाड़ ही ढूंढता रहता। नगर में कही भी झगड़ा, फसाद आदि हो फटे पैर फंसाकर भांजगढ़ी करने पहुंच जाता है। यही नही इसके अतिरिक्त कोई भी अवैधानिक कार्य सभी में समझौते के नाम पर रूपये ऐठने का भरसक प्रयास करता। अधिकांष मामलो में ग्रामीणजन इसके झांसे में आ जाते पर कुछेक मामलें में इसकी सुस्ती भी दूर हो जाती। सूत्रों की माने उक्त वर्दीधारी कुछेक दिवस पूर्व ग्रामीणों के विवाद में कूद पड़ा था। ग्रामीणों के विवाद में चल रहा समझौता वर्दीधारी को पसंद नही आया तो माल एठने की जुगत में लगा सेखी बघारने, किंतु ग्रामीणों की वर्दीधारी की सेघी रास नही आई और पूर्व से गुस्से में लबरेज ग्रामीणों ने वर्दीधारी जमकर लू उतारी। बताते है कब कौन कहा से हाथ साफ कर रहा था किसी को पता नही। मामला शांत हुआ तो आदतानुसार फिर से समझौता। और करता भी क्यूं नदी वर्दी के साथ अवैध वसूली करने वाली पूरी जमात का संरक्षण जो था।

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