सुनिल डामर
जिस प्रकार सरकार एवं पुलिस प्रशासन सामान्य व्यक्तियों पर पॉक्सो एक्ट की धाराओं का तत्काल उपयोग कर कठोर कार्यवाही करता है,उसी प्रकार शिक्षा विभाग को भी आरोपी शिक्षक के विरुद्ध केवल निलंबन तक सीमित न रहकर, पॉक्सो एक्ट की धाराओं के तहत दंडात्मक कार्यवाही करनी चाहिए। जब यह स्पष्ट है कि आरोपी शिक्षक ने नाबालिग छात्राओं के साथ अमानवीय अपराध किया है,तो मात्र निलंबन की कार्यवाही किसी भी प्रकार से न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती।
अब प्रश्न यह है कि जब सामान्य नागरिकों को पॉक्सो एक्ट की धाराओं के अंतर्गत सीधे जेल भेजा जा सकता है,तो आरोपी शिक्षक को इसी प्रकार की कठोर सजा क्यों नहीं दी जाती…..? क्या शिक्षा विभाग का कर्तव्य केवल निलंबन भर करना है,या फिर नाबालिग आदिवासी बच्चियों को न्याय दिलाने के लिए कठोर कदम उठाना भी उनकी जिम्मेदारी है….?

यह आवश्यक है कि शिक्षा विभाग ऐसी घटनाओं पर कठोर और उदाहरण प्रस्तुत करने वाली कार्यवाही करे ताकि समाज को यह संदेश मिले कि मासूम बच्चियों के साथ किसी भी प्रकार की अमानवीयता करने वाले को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।केवल निलंबन पर्याप्त नहीं है—बल्कि आरोपी को जेल भेजकर कठोर दंड दिलाना ही न्यायोचित और नैतिक कदम होगा।
पूर्व में भी ऐसी घटनाएं हुई शिक्षा विभाग में परंतु कुछ समय बाद इन शिक्षकों को बहाल कर अपने विभाग में ही प्रमोशन मिला,जिससे इन आपराधिक प्रवृति के शिक्षकों के हौसले बुलंद होते गए और शिक्षा जगत को बदनाम कर रहे हैं यदि इस शिक्षक पर पास्को एक्ट के तहत कार्यवाही यदि शिक्षा विभाग कठोर कार्यवाही करता है तो अपराध पर तो अंकुश तो लगेगा ही नाबालिक छात्राओं को न्याय भी मिलेगा।