भियां सभी को राम राम…!
लो भियां मैं फिर आ गिया कुछ कही-अनकही के साथ…!
भियां मंत्रीजी की लुटिया डुबोने वाले जावेद और चुन्नु के नाम बडे और काम खोटे है… भियां जावेद बम्बई और आस पास के नगरों से अधिकारी, नेता और सेठों से अपना काम निकवाने के लिए रस भरिया लाता है और परोसता है… इन दोनों की जोडी सारे उंन्दे सत्ते काम करने में माहीर है… भियां चुन्नु के फार्म हाउस पर ये दोनों जुवे की बडी टेबल चलाते है… इस फार्म हाउस पर जुआ खेलने के साथ साथ शराब, कबाब और हवस की प्यास बुझाने के लिए शबाब या फिर यूं कहे रस भरियों की व्यवस्था भी होती है… यहां जुआ खेलने के लिए बडे बडे लोग ही आते है… जुवे के साथ साथ नचनियां यहां नाचती भी है… नचनियों पर जो रूपये उडा रिये होते है… उन उडने वाले रूपयों में भी चुन्नु का एक हिस्सा होता है… जुवे की टेबल पर हर रोज दो तीन लाख की तो हर रोज नाल कटती है… उपर से नाचने वाली नचनियां पर उडने वाले रूपयों का भी हिस्सा मिल जाता है… उसी से तो ये शानोशौकत दिखाई जाती है… अब भियां इनकों टेबल चलाने के लिए एक प्यादे की जरूरत थी तो इन्होने कप्तान को अपना प्यादा बना लिया… और केने लग गिये कप्तान को तो हम लेकर आये… जैसा कहेंगे.. कप्तान वैसा करेगा…. और बैठा दिया अपने बच्चे संभालने वाले गुर्गे को कप्तान के पास… जो बस दिन रात कप्तान की चापलुसी करने में लगा रेता है… लेकिन कप्तान को नी मालुम की उसके नाम का दुरूपयोंग किया जा रिया है… अब भियां जो लोगों को रस भरियां परोस उनके नाचने पर उडने वाले रूपये खाये…उसकों हम क्या केंगे… इससे अच्छे तो भियां भिखारी होते है जो भीख मांग कर अपना पेट तो पाल लेते है… भियां और भी भौत कुछ है… वो बाद में बिताउंगा…!
अब जा रिया… लेकिन जाते जाते एक बात और बिता दुं…. भियां चुन्नु और जावेद तुम दोनों के भोत रेले है… अगर खोलना चालु किया नी तो किसी को मुंह दिखाने लायक नी रोगे… इसलिए के रिया हुं… अपने बच्चे संभांलने वाले गुर्गे को के दो… ये चुगलियां करना बंद कर दे… अगर अब कुछ बात सामने आई जो उसका घर तो पुरे कांच का है एक पत्थर मारा तो सब कुछ दिखने लगेगा… अब जा रिया जय राम जी की…!