Homeअलीराजपुरसंगठनवाद एक सामाजिक बिमारी है।साथीयो जब इस देश में-     

संगठनवाद एक सामाजिक बिमारी है।साथीयो जब इस देश में-     

दिलीप सिंह भूरिया अलीराजपुर ब्यूरो चीफ 

आदिवासी एकता परिषद नामक संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई ।

 

जब आदिवासी मुक्ति संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई ।

 

जब जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई।

 

जब आदिवासी छात्र संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई ।

 

जब आदिवासी कर्मचारी संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई ।

 

जब आदिवासी परिवार संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई ।

 

जब गोंडवाना स्टुडेन्ट युनियन संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई।

 

जब बिरसा ब्रिगेड संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई ।

 

जब आदिवासी विचार मंच संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई।

 

जब भीलप्रदेश विधार्थी मोर्चा बना तो कोई दिकत नही हुई ।

 

जब जय औंकार भीलाला सेवा समीती संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई।

 

जब आदिवासी महासभा संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई ।

 

जब जय एकलव्य संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई ।

 

जब सर्व आदिवासी समाज संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई।

 

जब भारतीय ट्राइबल टाईगर सेना संगठन बना तो कोई दिकत नही हुई।

 

लेकिन समाज के लोगो को तब दिकत हुई जब मध्यप्रदेश में

“भील सेना संगठन” नाम का संगठन बना

इस संगठन का कार्य विस्तार न हो इसलिए इस संगठन पर उप-जातिवाद फैलाने के के आरोप लगाना शुरू हो गये ताकी सामाजिक दबाव डालकर इसे दबाया जा सके लेकिन आदिवासी शब्द की आड में संगठनवाद की सामाजिक बिमारी का निर्माण कहाँ से हुआ? क्यों हुआ? और इस आदिवासी शब्द की आड में कौन लोग अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते है इस पर किसी ने कोई अध्ययन या शोध नही किया।

 

हम एक सामाजिक मिशनरी कार्यकर्ता है इसलिए हम संगठनवाद की सामाजिक बिमारी के सख्त विरोधी है क्योंकि कहीं न कहीं इन संगठनो के द्वारा समाज की सामाजिक एकता टुटती है समाज में सामाजिक बिखराव होता है सामाजिक टकराव होता है

सामाजिक संगठनो के माध्यम से आप सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के जैसे भीड इकठ्ठा कर सकते हो ये भीड दिखाकर व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए राजनितिक टीकट प्राप्त कर सकते हो लेकिन समाज में सामाजिक परिवर्तन नही ला सकते न ही सामाजिक व्यवस्था का निर्माण कर सकते हो।

 

क्या ये धरना,प्रदर्शन,आंदोलन और भाषण हम आदिवासियों की सामाजिक समस्याओं के समाधान है?

 

समाज में कितने संगठन है ये मायने नही रखता अगर हमारे सारे सामाजिक संगठनो की “उद्देश्य की एक रूपता” है तो मतलब हमारे सभी सामाजिक संगठन का एक मैव उद्देश्य सिर्फ हमारे “जल,जंगल,जमीन” की सुरक्षा है तो कोई बात नही लेकिन अगर हमारे सामाजिक संगठनो के अलग अलग उद्देश्य है तो हमारी सामाजिक एकता का टुटना तय है।

 

समाज के लिए सामाजिक कार्य बिना किसी सामाजिक संगठनो की लेबल लगाये भी हो सकता है क्योंकि सामाजिक मिशन का हर सच्चा मिशनरी कार्यकर्ता इस बात का उदाहरण है

सामाजिक मिशन का मिशनरी कार्यकर्ता न कभी किसी सामाजिक संगठन का लेबल लगवाता है न कभी राजनीतिक स्वार्थ के लिए समाज का उपयोग करता है।

 

सामाजिक मिशन का मिशनरी कार्यकर्ता जीवन भर निस्वार्थ रूप से चार चीजो पर कार्य करता है –

1) पुरखो की सामाजिक विचारधारा का निर्माण और विस्तार

2) सामाजिक तंत्र का निर्माण

3) पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के माध्यम से समाज की अपनी व्यवस्था के निर्माण के प्रति समाज को जगरूक करना।

4) समाज की अपनी सामाजिक व्यवस्था के माध्यम से समाज की वर्तमान और भवी पीढी की सामाजिक सुरक्षा करना।

5) समाज में प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं का निर्माण करना।

 

और ये प्रक्रिया छोटी नही है इसमें कम से कम 100 साल लगते है समाज की चार पीढीयो को शतत प्रयास करना पडता है तब जाके समाज की सामाजिक सुरक्षा निश्चित होती है। बस अंतत: समाज के सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को इतना ही बोलुंगा की किसी भी संगठन की बुराई मत करो बलकी हो सके तो उसे साथ लेकर चलो आपसी समन्वय स्थापित करो।

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