
दिलीपसिंह भूरिया
मामला जोबट विकासखंड के ग्राम पहाड़वा का है जहां पर शासकीय प्राथमिक विद्यालय तड़वी फलिया मैं मौजूद है जिसमें प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालय दोनों ही के कुल 92 बच्चे शिक्षा प्राप्त करने के लिए आते हैं प्राथमिक विद्यालय भवन की हालत इतनी जर्जर है की आए दिन छत का प्लास्टर गिरता रहता है जिससे बच्चों के साथ कोई बड़ी घटना घटित होने की संभावना बनी रहती है साथ ही साथ बच्चों की संख्या अधिक होने के कारण बच्चों को बाहर खुले में त्रिपाल व बरसादी बांधकर पढ़ाना शिक्षकों की मजबूरी बन गई है और किचन सेट में भी खाना बनाते वक्त खाने में प्लास्टर के टुकड़े गिरते रहते हैं बच्चों की संख्या अधिक होने का मुख्य कारण यह है कि तड़वी फलिया पाहडवा में तकरीबन 12 वर्ष पूर्व माध्यमिक विद्यालय भवन का कार्य शुरू हुआ था व आधा अधूरा कार्य करके उसे वहीं छोड़ दिया गया ना भवन में छत है ना ही वहां पर प्लास्टर हुआ है जिसके कारण वहां पर माध्यमिक विद्यालय को संचालित करना संभव नहीं है इसी के चलते हैं माध्यमिक विद्यालय के बच्चों को भी प्राथमिक विद्यालय में ही शिक्षा दी जा रही है नाही वहा पर शौचालय की कोई व्यवस्था है जिसके कारण बालक बालिकाओं को सोच के लिए खुले में जाना पड़ता है माध्यमिक विद्यालय का भवन कार्य पूर्ण ना होने से लगभग 12 वर्षों से वह एक खंडहर में तब्दील हो चुका है इसी खंडहर के पास वास्कला फलिये में ऐसा ही एक और खंडहर है जहा ना तो खिडकी ना दरवाजे और ना ही छत है लेकिन जिम्मेदार उसे विद्यालय का नाम देते हैं खुले आसमान के नीचे बच्चे पढ़ने को मजबूर और शिक्षक पढ़ाने को मजबूर जिम्मेदारों ने जब हाथ खड़े किए तो वहां पदस्थ शिक्षक ने अपने निजी खर्चे से कुछ बास व लकडी का ईस्तेमाल कर के बरसाती को ऊपर से ढाक कर वैकल्पिक व्यवस्था की कच्ची जमीन पर पढ़ने वाले बच्चों को बारिश में कभी पानी तो कभी सांप बिच्छू जैसे जीवो भी भय बना हुआ रहता है कड़कड़ाती हुई ठंड गर्मी व बारीश जैसी इतनी दयनीय स्थिति में आखिरकार बच्चे कैसे पढ़ सकेंगे ना तो बैठने के लिए अच्छी जमीन ना पीने के लिए साफ पानी ना ही शौचालय की कोई उचित व्यवस्था पूरे मामले से जिम्मेदार अधिकारी अवगत पूरा मामला जिम्मेदार अधिकारियों के संज्ञान में लेकिन कोई भी अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण करने या ठोस कदम उठाने को तैयार नहीं क्यों आखिर कहीं ऐसी मूलभूत सुविधाओं से आदिवासी ग्रामीण बच्चों को वंचित रखा जाता है क्यों एक हल चलाने वाले किसान के बच्चो को अच्छी शिक्षा व्यवस्था नहीं दी जा रही है कब तक इस तरह से आदिवासियों का शोषण किया जाएगा या कोई जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी को पूरा करेगा।