HomeUncategorizedक्या निजी स्कूलों की मनमानी पर मेहरबान है जिला प्रशासन...!

क्या निजी स्कूलों की मनमानी पर मेहरबान है जिला प्रशासन…!

 

 

voice of Jhabua        voice of Jhabua

 

शासन शिक्षा के क्षेत्र में कितनी भी गाईडलाईन बना दे… मगर निजी स्कूल संचालक इन गाईड लाईनों की धज्जियां उडतो ही है। वो भी इसलिए कि शासन के नुमाईदें चंद लक्ष्मी यंत्रों के चक्कर में देख कर भी अनदेखा करने में नही चुकते है। ऐसे में ये निजी स्कूल संचालक अपनी दुकानदारी अपने मनमुताबिक चलाते है। वर्ष 2022- 23 नया शिक्षा सत्र प्रारंभ हो चुका है और निजी स्कूलों में मोटी फिस के बोझ के साथ साथ अभिभावक मंहगे दामों की स्कूल ड्रेस और पुस्तकों की खरीदनी के बोझ से दब चुके है। शासन के निर्देशों के बावजूद भी निजी स्कूलों की पुस्तके व ड्रेस निश्चित दुकानों पर ही मिल रही है वो भी मंहगे दामों पर। अगर किसी को किताबें नही चाहिए सिर्फ उन्हे कॉपियां चाहिए तो दुकानदान उन्हे देने से मना कर देता है।

कलेक्टर साहब ने किया था आदेश जारी

5 अप्रैल को कलेक्टर सोमेश मिश्रा द्वारा आदेश जारी किया था कि सभी निजी स्कूलों में पुस्तक और स्कूल ड्रेस उपलब्ध कराने वाली कम से कम 5-5 दुकानों के नाम विद्यालय के सुचना पटल पर स्वच्छ एवं स्पष्ट रूप से चस्पा करें। लेकिन जिम्मेदारों ने इस आदेन का परिपालन नही किया। वहीं जिम्मेदार विभाग के अधिकारियों ने भी एक भी स्कूल का इस हेतु निरिक्षण तक नही किया। जिससे ऐसा प्रतित होता है कि लक्ष्मी यंत्रों के सामने कलेक्टर साहब के आदेश भी क्षणिक है। तभी तो एक बार भी जिम्मेदार अधिकारियों ने किसी भी स्कूल पर कार्रवाई तक नही की।
लक्ष्मी यंत्रों के सामने कलेक्टर साहब का आदेश कुछ भी नही
लक्ष्मी यंत्रों के सामने नतमस्तक जिम्मेदार अधिकारी कलेक्टर साहब का आदेश कुछ भी नही है। तभी तो निजी स्कूल संचालक और दुकानदार मिल कर अभिभावकों की जेब पर डाका डाल रहे है। अगर थोडा भी इन्हे कलेक्टर साहब के आदेशों का भय रहता तो ये तुंरत आदेश पर अलम करते मगर ऐसा नही हुआ।

तीन गुना महंगी है निजी प्रकाशकों की किताबें……

जिले में 265 से अधिक निजी स्कूल हैं। इन स्कूलों में निगम और सीबीएसई पाठ्यक्रम के बजाए निजी प्रकाशकों की पुस्तकें पढ़ाई जा रही है। यह पुस्तकें निगम और सीबीएसई की तुलना दो से तीन गुना मंहगी है। वहीं ये किताबें किसी एक विशेष दुकान पर मिलने की वजह से अभिभावकों को मुंहमांगे दाम देना पड़ रहे हैं। हर साल स्कूल संचालकों और पुस्तक विक्रेताओं के गठजोड़ से अभिभावक त्रस्त रहते हैं।

किताबों के साथ स्कूल ड्रेस का भी यही हाल……..

निजी स्कूलों में चलने वाली किताबों के साथ उनकी ड्रेस भी बाजार में चुनिंदा दुकानों पर ही उपलब्ध है। परिणामस्वरूप किताबों की भांति अभिभावकों को स्कूल ड्रेस के लिए भी मुंह मांगे पैसे चुकाने होते हैं। खास बात तो यह है कि शहर में स्टेशनरी की करीब आधा सैकड़ा से अधिक दुकानें हैं। वहीं रेडीमेड गारमेंट्स की संख्या इनसे दोगुनी है। लेकिन शहर में 90 फीसदी स्कूल 2 से 4 स्टेशनरी और रेडीमेड दुकानों पर सेट हैं।

कलेक्टर साहब को देना होगा ध्यान

जिले में स्कूल ड्रेस और पुस्तकों के नाम पर जमकर लुट मची हुई है। अगर किसी अभिभावक को टाई और बेल्ट खरीदना हो तो दुकानदार नही दे रहे है। ऐसे में अभिभावकों को पुरी ड्रेस खरीदनी पड रही है वहीं पुस्तक विक्रेताओं का भी यही हाल है उनके भी पुस्तकों का सेट खरीदना होगा। ऐसे में अभिभावकों की जेब पर ये दुकानदार जमकर डाका डाल रहे है। ऐसे में कलेक्टर साहब को इस ओर ध्यान देते हुए इन लुटेरें दुकानदारों पर कार्रवाई करनी चाहिए ताकि अभिभावक लुट से बच सके।

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