वाह चंदू लाला…! जिनके बल पर राजनिती कर रहे है उन्हे ही तुच्छ समझ रहे हो…? आदिवासी अब ना समझ नही रहा पढ लिख गया है…?
चुनाव आते ही नेताओं के सर मतदाताओं के सामने नतमस्तक हो जाते है… और पिछवाडा भी धोने तैयार हो जाते है… मगर चुनाव जीतने के बाद उन्ही मतदाताओं को नेता भुल जाते है… झाबुआ जैसे आदिवासी जिले में आज भी जातिवाद का दंश फैला हुआ है… यहां आज भी आदिवासियों को तुच समझा जाता है… सुना है ऐसा ही कुछ 20 सालों से आदिवासियों ने नाम पर रोटी सेक अपने बच्चे पाल रहे चंदुलाला करते है… जिनके घर के दिये भी आदिवासियों के नाम पर कमाये रूपयों से जलते है। आज भी वो किसी आदिवासी के घर पहुंचते है तो उनके घरों का पानी तक नही पीते है… जातपात के नाम पर आज भी अगर कोई आदिवासी इनके घर पहुंचता है तो उन्हे बाहर ही बैठाया जाता है… पिछले 20 वर्षो से आदिवासियों के नाम पर मिलने वाली करोडों की राशि में चंदुलाला ने कई गोलमाल किए जो हम आस पास के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास कार्यो को देख कर कह सकते है।
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