



विनय पंचाल, पिटोल। पिटोल के राधा-कृष्ण मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा का समापन शनिवार को भक्तिमय वातावरण में हुआ। अंतिम दिन गौ संत श्री रघुवीर दास जी महाराज ने श्रद्धालुओं को भगवान को पाने का मार्ग बताते हुए कहा कि जब भक्त का प्रेम, त्याग, समर्पण और विरह अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचता है, तब भगवान भी अपने भक्त के प्रेम से बंध जाते हैं।
महाराज ने कहा कि भगवान को पाने के लिए मन में सच्ची तड़प होना आवश्यक है। मुख प्रभु का नाम ले, हाथ उनकी सेवा में लगें, आंखें उनके दर्शन के लिए व्याकुल हों और चित्त में भगवान के अतिरिक्त किसी अन्य का चिंतन न रहे, तो भगवान स्वयं ऐसे भक्त की ओर खिंचे चले आते हैं।
*गोपी चंदन के प्रसंग से समझाई भक्ति की पराकाष्ठा*
महाराज ने भक्त और भगवान के प्रेम को समझाते हुए द्वारका से जुड़ा भावपूर्ण प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने एक बार बीमारी की लीला रची। कोई उपचार उनकी पीड़ा दूर नहीं कर पाया। नारदजी के पूछने पर भगवान ने कहा कि सच्चे भक्त के चरणों की रज धारण करने से ही उन्हें इस पीड़ा से मुक्ति मिल सकती है।
लेकिन भगवान को अपने पैरों की धूल देने का साहस कोई नहीं जुटा सका। जब नारदजी राधा रानी और गोपियों के पास पहुंचे और उन्हें श्रीकृष्ण की पीड़ा के बारे में बताया, तो कृष्ण-वियोग में व्याकुल राधा रानी और गोपियों ने बिना किसी संकोच के अपने चरणों की रज दे दी। उन्हें न पाप की चिंता थी, न उसके परिणाम की। उनके मन में केवल एक ही भाव था कि किसी भी तरह उनके कृष्ण की पीड़ा दूर हो जाए।
महाराज ने कहा कि यही सच्ची भक्ति की पराकाष्ठा है, जहां भक्त स्वयं का हित भूलकर केवल भगवान का हित सोचता है। भक्त अपने भगवान के लिए स्वयं को मिटा देता है और भगवान उसी प्रेम में भक्त की चरण-रज तक धारण कर लेते हैं।
उन्होंने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार जिस स्थान पर भगवान ने उस पवित्र रज को धारण किया, वह गोपी तालाब के नाम से प्रसिद्ध हुआ और वहां की मिट्टी गोपी चंदन कहलायी, जिसे आज भी श्रद्धालु अपने मस्तक पर धारण करते हैं।
*राधा रानी और गोपियों के विरह ने किया भाव-विभोर*
राधा रानी और गोपियों के श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम, विरह, त्याग और समर्पण के प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। महाराज ने कहा कि भक्ति का अर्थ केवल भगवान से कुछ मांगना नहीं, बल्कि अपने आराध्य में स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर देना है।
उन्होंने कहा कि भक्त का भगवान के प्रति समर्पण और भगवान का अपने भक्त के प्रति प्रेम ही भक्ति का सबसे सुंदर स्वरूप है।
*भजनों पर झूमे श्रद्धालु*
कथा के दौरान भजनों की मधुर धुन पर श्रद्धालु स्वयं को नृत्य करने से नहीं रोक पाए। महिला-पुरुष, युवा, बुजुर्ग और बच्चे सभी भक्ति के रंग में रंगे नजर आए। इन दिनों पिटोल का पूरा वातावरण भक्तिमय रहा और सभी आयु वर्ग के भागवत प्रेमियों ने कथा का रसपान किया।
*समापन पर निकली भव्य शोभायात्रा*
कथा समापन के अवसर पर राधा-कृष्ण मंदिर से भव्य शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा पिटोल के प्रमुख मार्गों और चौराहों से होते हुए पुनः मंदिर पहुंची। पूरे मार्ग में श्रद्धालु भजनों पर नाचते-झूमते और भगवान के जयकारे लगाते हुए चले।
नगर में जगह-जगह शोभायात्रा का स्वागत किया गया। भागवतजी का घर-घर पूजन हुआ, वहीं गौ संत श्री रघुवीर दास जी महाराज का भी श्रद्धालुओं ने स्वागत-सत्कार किया। कई स्थानों पर भक्तों के लिए जलपान की व्यवस्था की गई।
*कथा का संदेश — प्रेम, भक्ति और पूर्ण समर्पण*
कथा के अंतिम दिन महाराज ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि सच्ची भक्ति वह है, जिसमें भक्त भगवान के लिए स्वयं को भूल जाए और भगवान भी उसी निष्काम प्रेम से बंधकर अपने भक्त के हो जाएं।