क्या हमारे इन गावो का विकाश करने के लिए देवी देवताओं को आकाश से नीचे आना होगा।

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दिलीपसिंह भूरिया

 

आजाद नगर भाभरा तहसील मुख्यालय से मात्र 11 किलोमीटर दूर स्थित घने वनों के बीच ग्राम एरन व पुनियावाट के बीच की पुलिया रियासत युग से लेकर और आज आजादी के बाद भी एक छोटी सी पुलिया का निर्माण नही करना कही ना कही आदिवासी बाहुल्य इस ग्रामों का दोष क्या है ।क्या जिले का प्रशासन जाती देख कर सड़के और अन्य चीजों का निर्माण करते है कोई जिले का ऐसा अधिकारी नही है जो यहां की पुलिया का निर्माण करवा सके ।क्या जिले के विकाश की राशि में इन गावो को कुछ नही मिलता या मिलता भी है तो इतना सौतेला पन क्यों क्या इनका कुसूर इतना है जी यह शहरी आबादी की तरह शिक्षित नहीं मंदिर मस्जिदों के लिए लड़ते नही इसी कारण इनका विकाश नही ।क्या इनका वोट देश की सत्ता पर काबिज होने और शासन करने वाले नेताओ को नही दिया जाता ।क्या इनको अच्छी सड़को अच्छा पानी अच्छी शिक्षा अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं बिना सड़क और पुलिया के केसे पहुचेगी।सड़क और पुलिया बिना इनका समुचित विकाश संभव ही नहीं ।क्या यहा के यह आदिवासी देश के लिए अनाज उत्पादन नही करते ।और देश के नागरिक नही है । यह ग्रामीण सदियों से ही जंगलों पर पहाड़ियों पर बसे मकानों पर निवास तो जेसे तेसे कर लेते ही लेते है परंतु शहरी लोगो के तरह आप से मांग नही करते इसीकरण आप लोग इनको कुछ नही समझते ।शहरी नागरिक बिजली पानी शिक्षा स्वास्थ्य की सुविधाएं ना मिले तो प्रशासन की लू उतार लेते है परंतु इसके विपरित आदिवासी ग्रामों के नागरिक आपके द्वारा द्वारा तक आ आ कर अपने लिए इन्ही सुविधाओ की मांगे कर कर के थक जाने के बाद भी क्या इनको उन सुविधाओ का हक मांगने पर भी इन सुविधाएं इनको मिली है क्या ।क्या देश में सिर्फ शहरो का ही विकाश करने के लिए राशि आती है या उन शहरो के निवासियों का अधिकार है इन आदिवासियो का कुछ नही । जिले की अधिकतर राशि आदिवासी विकास की है जिसमे से शहरो को सड़को नालियों बिजली शिक्षा स्वास्थ्य सुविधाएं साफ पानी खेल मैदान धार्मिक आयोजन और सामाजिक आयोजन हेतु धर्मशालाएं और ग्रामीणों को अपने सारे आयोजन जंगल में पेड़ो के ही नीचे करने पड़ते है ।और कही कही कुछ जगह बने भी है तो वह दुर्दशा का शिकार है ।उसकी देखरेख की भी राशि का आवंटन नही होता।

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