सुनिल डामर
वर्तमान में गेहूं की बोवनी के बाद से ही किसानों को गेहूं के लिए यूरिया खाद की आवश्यकता होती है जो किसानों को आसानी से उपलब्ध होना मुश्किल हो गया है।यूरिया की कमी और किसानों की परेशानियों को उजागर करती तस्वीरें आप देख सकते हो,जहां खवासा में अन्नदाता दो बैग यूरिया के लिए सुबह 5 बजे से लंबी कतार में लगे हुए हैं।

ये तस्वीरें पूर्व मुख्यमंत्री व वर्तमान कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराजसिंह चौहान के ‘खेती को लाभ का धंधा’ बनाने के दावों की विफलता को उजागर कर रही है। क्योंकि किसानों को खाद के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है,जो खेती को लाभकारी बनाने के बजाय मुश्किल बनता जा रहा है।यह स्थिति यूरिया की उपलब्धता और सरकारी तंत्र के दावों की पोल खोल रही है। यूरिया के लिए संघर्ष करना किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है,जिससे उनकी खेती की लागत और परेशानी बढ़ रही है।

वही यूरिया कि किल्लत होने का फायदा उठाकर बामनिया खवासा पेटलावद सहित क्षेत्र के उर्वरक व्यापारी खाद की कालाबाजारी करके निर्धारित दर से अधिक राशि भी किसानों से वसूल रहे हैं। वही कृषि विभाग एवं प्रशासनिक जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारियों से जानकर भी अनभिज्ञ बने हुए हैं यह स्थिति कृषि विभाग और सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन की मिलीभगत की ओर इशारा कर रही है।