निलेश डावर वॉइस ऑफ झाबुआ
आदिवासी इलाकों में वैसे हर कोई अपना सिक्का जमाना चाहता है, यहां का समाज गरीब नही बल्कि दारू पर पैसा अधिक खर्च करना भी एक गरीब होने का कारण है। इसी बात का फायदा उठाते हुए दारू माफियाओं का जाल जिले में बढ़ता जा रहा है,
पहले कुछ गांवों तक दुकानें सीमित थी लेकिन धीरे धीरे ग्रामीण क्षेत्रों में भी पैर पसार रहा है, और दुकानों का विस्तार किया जा रहा है, गांव में पैसा एक्ट का नियम भी इनके लिए मायने नहीं रखता है, और दुकानें खोल दी जा रही है, दुकानों पर लागू होने वाले नियम भी नही है,
यहां एक एक बोतल नही बल्कि पेटियों में दारू बिकती है, और यह सब खुलेआम होता है, पुलिस चार पेटी लेकर निकलने वाले को रास्ते में रोककर परेशान कर सकती है कार्यवाही भी कर सकती है
लेकिन जो खुले आम बेच रहा है, उन्हे कुछ भी कहने की हिम्मत नही करती है। जिला प्रशासन, और आबकारी पर ये तमाचा है।