सुन लो रे…मास्टरों को तो सुधार दिया है,,,समुह वालो तुमको भी सुधार दुंगा।
बुरा जो देखन मैं चला,बुरा ना मिलीया कोई….
लक्की राठौड़ बरवेट
प्रिय पाठको आज मालवी पुराण तिसरा चैप्टर आपके सामने रख रहे है।
वाकया जरा युं है कि एक बार केंद्र की बैठक थी,बैठक में केंद्र के तमाम शिक्षकों के साथ-साथ,समूह संचालक और शिक्षा विभाग की एक ब्लॉक अधिकारी भी मौजूद थी।
केवल प्राचार्य को छोड़कर सभी लोग बैठक में उपस्थित होकर बैठक आरंभ कर दी गई।बैठक में जरूरी निर्देश के साथ-साथ अधिकारी द्वारा चर्चा की जा रही थी।तभी आदरणीय साहब अपनी मस्ती की पाठशाला से मदमस्त होकर इंट्री करते है,,समीप पड़ी कुर्सी पर एक पैर के ऊपर दूसरा पैर जमा कर बैठ जाते हैं।फिर कहते है,,,”सुन लो रे,, इन मास्टरों को तो मैंने सुधार दिया है,, और समूह वालों तुम भी सुधार जाना नहीं तो मैं सुधार दूंगा”। यह सब नजारा देखकर समीप बेठी अधिकारी भी आश्चर्य चकित रह जाती है,, लेकिन भोली भाली और ईमानदार होकर वह अधिकारी,,,बत्तमीज साहब से बात करना पसंद नहीं करती है।इसके बाद साहब यह कहकर निकल जाते हैं कि मेरा कोई दूसरे अधिकारी इंतजार कर रहे हैं।अभी तक तो पता चल रहा था कि पत्रकार पालक और बच्चों के साथ बदतमीजी हो रही है परंतु इस वाकये से प्रतीत होता है,अधिकारी के सामने भी….वही समूह वालों को भी यह बात नागवार गुजरी,,बाहर आकर समूह वाले बात करते रहे,,यह कैसा प्रिंसिपल है बोलने की तमीज नहीं,,,बात करने की तमीज नहीं,,,,
अब साहब को यह ज्ञात करवा देते हैं,, हम वर्षों से इन शिक्षकों को और इन समूह वालों को ईमानदारी और सच्ची निष्ठा के साथ काम करते हुए देखते आ रहे हैं… 2 वर्षों तक कंटीन्जेंसीज राशि न मिलने के बाद भी शिक्षकों ने विद्यालय का संचालन किया,,, और आज भी इमानदारी से समय पर पूरे संकुल के शिक्षक अपना काम करते हैं…. तो संकुल के शिक्षकों में साहब ने ऐसा क्या सुधार करवा दिया…. समूह वाले जो प्रतिदिन भोजन बनाते हैं… दो दो तीन तीन माह तक पैसे नहीं डालने के बाद भी अपना काम ईमानदारी से उधार लाकर करते हैं,,, तो अब उनको किस सुधार की आवश्यकता है??
दरअसल सुधार की आवश्यकता तो खुद साहब में है,, अपनी वाणी को संयम में रखो,, थोड़ा मदमस्त होना कम करो,, और खुद भी समय पर स्कूल भी आया करो….
मालवी पुराण का तिसरा अध्याय समाप्त…..
निरंतर जारी रहेगी,,पढ़ते रहिए वाईस आफ झाबुआ।