समूह से जुड़ने से पहले की स्थिति कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थीं। दुबली के घर में आय का एक मात्र साधन मजदूरी था जो पति और पत्नी दोनों मिलकर किया करते थे। महीने में उन्हें मात्र 4 हजार से 5 हजार रुपये तक मिलते थे। इतनी कम आय में घर का खर्चा चलाना, बच्चो की पढाई करवाना और बचत करना असंभव सा कार्य था। दुबली और उनके पति दोनों ही अशिक्षित थे। मजदूरी करने के अलावा उनके पास पैसे कमाने और एक सम्मानपूर्ण जीवन जीने का कोई और रास्ता नहीं था। कई दिन तो ऐसे निकल जाते थे। जब पुरे परिवार को दिन में बस एक वक्त का खाना ही नसीब हो पाता था। इन विषम परिस्थितियों में दुबली हिम्मत हार रही थी। साहुकारो का कर्जा भी बढ़ता जा रहा था जिसे चूका पाना असंभव सा ही प्रतीत हो रहा था।
स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद से दुबली के जीवन में व्यापक बदलाव आया है। दुबली ने आत्मनिर्भरता और स्वरोजगार की और अपने कदम मजबूती से बढ़ा लिए है। इस सम्बन्ध में चर्चा करते हुए दुबली बताती है, कि उनके सन् 2012 से ही उनके गाँव में आजीविका मिशन द्वारा स्वयं सहायता समूह संचालित हो रहे थे। दुबली के आसपास की परिवार इस आन्दोलन से जुड़ रहे थे और लाभ उठा रहे थे। दुबली तब समूह से नहीं जुडी क्योकि उनके पति ने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी। लेकिन जब दीदी को अपना जीवन सुधरने का कोई माध्यम नहीं दी। तब उन्होंने अपने आस पास की समूह सदस्यों से अपने पति को समझाने के लिए कहा। उनकी बातो से प्रभावित हो कर दीदी के पति ने उन्हें समूह से जुड़ने की अनुमति दी और वे अरुणा स्वयं सहायता समूह से जुड़ी उन्हें समूह संचालन का महत्त्व समझ आया और इस से होने वाले लाभ को उन्हें जल्दी ही महसूस किया। वे नियमित बचत करने लगी। समूह के माध्यम से उन्होंने बैंक जाकर बात करना सिखा, हस्ताक्षर करना सिखा और अपने जीवन को बदलने का एक अवसर भी प्राप्त किया। उन्होंने सबसे पहले जो 1000 रुपये मिले उस से दीदी ने किराने का जरुरी सामन खरीदा। दीदी के आत्म विश्वास को इस से बल मिला। सीआईएफ से मिली 10 हजार रुपये की राशी से दीदी ने अपना कर्जा चुकाया। इसके बाद जब दीदी के समूह का सीसीएल हुआ तो दीदी ने उस राशी में से 40 हजार रुपये लेकर अपना बचा हुआ कर्जा भी चूका दिया और एक छोटी गुमटी शुरू की जिसमे किराने का सामान रखा। दुबली की वह दुकान उनके फलिए की एक मात्र दुकान थी इस वजह से फलिए किए लोगो को भी दूर नहीं जाना पड़ता है और दीदी को भी स्थायी ग्राहक मिल चुके है। अब दुबली आसानी से 10 हजार रुपये तक हर महीने कमा लेती है। वे आज एक समपूर्ण जीवन जी रही हैं और उने इस जुझारू रवैये के कारण सभी सदस्यों ने उन्हें समूह अध्यक्ष भी चुन लिया है। दुबली अपने जीवन में आये इन अभूतपूर्व बदलावों के लिए आजीविका मिशन को धन्यवाद देती है।
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