परिवेश पटेल
चैत्र नवरात्र पर्व में यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। रोज अलसुबह से लेकर देर शाम तक यहां भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। रायपुरिया के आसपास के इलाकों से भी रात में यहां महिलाएं तथा बालिकाएं गरबा रास करने पहुंचती हैं। नवरात्र में रोजाना माताजी का विशेष श्रृंगार व पूजा-अर्चना होती है। घाटी पर स्थित इस मंदिर के ठीक नीचे कलकल बहती हुई पंपावती नदी का सौंदर्य देखते ही बनता है।
रियासतकालीन है मंदिर
नगर के बुजुर्ग बताते हैं कि यह मंदिर करीब पांच सौ साल पुराना है, तब से आज तक केवल दो बार ही मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ है। पहली बार 1672 ई. में भटेवरा समाज द्वारा जो राजस्थान से आए थे तथा दूसरी बार नगर के राजपरिवार द्वारा इसका जीर्णोद्धार हुआ है। मंदिर के पीछे भी एक कहानी प्रचलित है, कहते हैं पंपापुर सरोवर के किनारे भीम की पत्नी हडप्पा ने नरबलि रोकने के लिए माताजी को यहां प्रसन्ना किया था, क्योंकि घटोत्कच भीम की बलि चढ़ाना चाहता था। समीप बहने वाली नदी का नाम भी इसीलिए पंपावती पड़ा है।
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि भद्रकाली और चामुंडा माता की मूर्ति दिन में तीन बार रूप बदलती हैं। प्रातः से 12 बजे तक मां बाल अवस्था, दोपहर को युवा और शाम 6 से सूर्योदय तक वृद्ध रूप धारण कर दर्शन देती हैं। तीनों रूपों के दर्शन के लिए हर समय भक्तों की भीड़ यहां रहती है। माता की महिमा निराली है। सच्चे मन की गई मनोकामनाएं भी पूर्ण करती हैं। दोनों ही नवरात्र में माता के दर्शन के लिए पेटलावद, रायपुरिया,अनंतखेड़ी,रामनगर,बनी सहित अन्य ग्रामीण क्षेत्रों सें श्रद्धालु प्रतिदिन सुबह-शाम के समय पैदल दर्शन करने जाते हैं।