स्थानीय जैन तीर्थ श्री रिषभदेव बावन जिनालय पर विराजित प.पूज्य साध्वीजी भगवंत श्री रत्नरेखा श्री जी म.सा. आदि ठाणा 3 की पावनकारी शुभ निश्रा में रविवार को ज्ञानपंचमी आराधना पर्व तप जप के साथ मनाई गई इस अवसर पर 125 से अधिक श्रावक श्राविकाओं ने उपवास – आयम्बिल एकाशना आदि तप के साथ ज्ञान के देववंदन की क्रिया संपन्न की। श्री संघ के वरिष्ठ अशोक कटारिया ने बताया कि आज ज्ञानपंचमी पर्व होने पर जिनालय में सुबह से ही दर्शन वंदन एवं पूजन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी
ज्ञान की वासक्षेप पूजा वधामणा कर आरती उतारी गई
पुज्य साध्वी जी भगवन्त ने प्रात: 9 बजे विशिष्ट मंत्रोच्चार के साथ ज्ञान की आराधना प्रारंभ की जिसके अंतर्गत सर्वप्रथम विशिष्ट ज्ञान की पुस्तकों और शास्त्रों के सम्मुख वासक्षेप पूजा की क्रिया प्रारंभ हुई। वासक्षेप पूजा का लाभ श्रीमती बिन्दु यशवंत जी भंडारी परिवार ने लिया, ज्ञान के वधामणा का लाभ विशिष्ट मंत्रोच्चार के साथ सोना चांदी आदि बहुमूल्य रत्नों से रितेश बाबूलाल जी कोठारी परिवार सिलेक्शन ने किया पश्चात ज्ञान की आरती शार्दुल कुमार ,जीनांश निखिल भंडारी परिवार के द्वारा उतारी गई ।
51 खमासमणा देकर देववंदन की क्रिया की
मतिज्ञान श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनः पर्यव ज्ञान एवं केवलज्ञान इन पाँच प्रकार के ज्ञान की विधिवत देववंदन की क्रिया पुज्य साध्वी जी भगवंत ने 9.30 बजे प्रारम्भ की क्रमशः पांच ज्ञान के 28, 14, 6, 2 एवं 1 इस प्रकार कुल 51 प्रदक्षिणा प्रदान करते हुए क्रिया संपूर्ण की। अंत में 51 लोगस्स का काउसग्ग कराया गया क्रिया में 2 घंटे से अधिक का समय लगा। कार्यक्रम का संचालन श्रीसंघ अध्यक्ष संजय मेहता द्वारा किया गया।
पहले ज्ञान फिर क्रिया”-*पूज्य साध्वी श्री
पुज्य साध्वीजी भगवंत ने ज्ञान के महत्व को समझाते हुए कहा कि “पढमं नाणं तओ दया” अर्थात प्रथम ज्ञान पश्चात दया, जीव में जब ज्ञान की प्राप्ति होगी तो वह अच्छे से धर्म क्रिया एवं धर्म मार्ग पालन कर सकता है अतः ज्ञान सर्वप्रथम आवश्यक है। गुरुदेव के संस्मरण सुनाते हुए कहा कि पूज्य आचार्य देव श्री हेमेन्द्र सुरिश्वर जी म.सा.जी ने अपनी 92 वर्ष की आयु पर्यन्त प्रत्येक पंचमी को उपवास तप के साथ पूर्ण की। पुज्य साध्वी जी से प्रेरित होकर कई श्रावक श्राविकाओं ने प्रत्येक माह की पंचमी को आयम्बिल तप करने का नियम अंगीकार किया।