सुनिल डामर
शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए राज्य से लेकर केंद्र की सरकार एडी चोटी का जोर लगा रही है। इसके बावजूद सरकारी स्कूलों की स्थिति दयनीय होती जा रही है। हालात यह है कि बुनियादी सुविधाएं तक स्कूलों से नदारद है।अब सवाल यह है कि जब बच्चों को पढाई के लिए सही वातावरण ही नहीं मिलेगा तो वह कैसे पढाई करेंगे..?

झाबुआ जिले के थांदला विकास खंड अंतर्गत ऐसे कई स्कूल भवन है जिनकी जर्जर स्थिति बनी हुई है जिसके बावजूद नौनिहाल अपनी जान जोखिम में डालकर जर्जर भवनों में शिक्षा ग्रहण करने को मजबूर हैं। लेकिन जिम्मेदार विभाग कुंभकर्ण की नींद से सोया हुआ है।

कुकडीपाडा संकूल के प्राथमिक विद्यालय फंटा फलिया कुकडीपाडा में छत से पानी टपकने से कमरे भर गए।जिसे बच्चों को बाहर बैठना पड़ रहा है।यही स्थिति प्राथमिक विद्यालय झोडिया फलिया परवाडा की है जहां पर स्कूल की छत से प्लास्टर गिर रहा है।जिम्मेदारों का इस ओर ध्यान ही नहीं है। प्रतिवर्ष सिर्फ कागजों में जर्जर भवनों की जानकारी मांग ली जाती है।जो कागजों में ही सिमट कर रह जाती है।वही जर्जर भवनों के लिए आने वाली राशि से कागजों में ही मरम्मत कर दी जाती है।लेकिन धरातल पर स्कूल भवनों की स्थिति जस की तस हैं।