
झाबुआ। जिले की शालाओं में शिक्षकों की कमी का असर सीधे बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। कई स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं होने से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। ऐसे समय में जनजातीय कार्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है।
मामला शिक्षक संजय जैन से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि उन्हें उनके मूल पद शिक्षक के बजाय जनजातीय कार्य विभाग में उपयंत्री का प्रभार दिया गया है। सवाल यह है कि जब विभाग में उपयंत्री के पद पर काम करने के लिए अलीराजपुर से उपयंत्री जॉइनिंग कर चुके हैं, तो इसके बावजूद शिक्षक संजय जैन को उनके मूल पद पर स्कूल में पढ़ाने के लिए रिलीव क्यों नहीं किया जा रहा है?
एक तरफ स्कूलों में शिक्षकों की कमी है और दूसरी तरफ एक शिक्षक को विभागीय तकनीकी कार्य का प्रभार देकर स्कूल से दूर रखा जा रहा है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि बच्चों की पढ़ाई प्राथमिकता है या विभागीय व्यवस्था में एक शिक्षक को उपयंत्री का प्रभार देना?
अलीराजपुर से उपयंत्री आ गए, फिर भी शिक्षक क्यों नहीं लौटे स्कूल?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अलीराजपुर से आए उपयंत्री द्वारा पदभार ग्रहण कर लिया गया है, तो शिक्षक संजय जैन को अब तक उनके मूल पद पर वापस क्यों नहीं भेजा गया? आखिर ऐसी कौन-सी प्रशासनिक आवश्यकता है जिसके चलते उपयंत्री की उपलब्धता के बाद भी शिक्षक को उसी प्रभार में बनाए रखा गया है?
जिम्मेदारों से सीधे सवाल
* जब स्कूलों में शिक्षकों की कमी है तो शिक्षक संजय जैन को स्कूल में पढ़ाने के लिए रिलीव क्यों नहीं किया जा रहा?
* अलीराजपुर से उपयंत्री के जॉइन करने के बाद भी शिक्षक को उपयंत्री का प्रभार क्यों सौंपा गया है?
* क्या विभाग में उपयंत्री के पद का काम कराने के लिए शिक्षक की ही आवश्यकता है?
* बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने की जिम्मेदारी आखिर किसकी होगी?
* शिक्षक को उसके मूल पद पर कब वापस भेजा जाएगा?
मामला सिर्फ एक शिक्षक के प्रभार का नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा को लेकर विभाग की प्राथमिकता का है। यदि विभाग में उपयंत्री उपलब्ध है, तो फिर शिक्षक को उसके मूल दायित्व से हटाकर रखने की जरूरत क्या है? अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इन सवालों का जवाब देते हैं या फिर यह व्यवस्था यूं ही चलती रहती है।