भागवत कथा के सातवें दिन नगर में नीकली शौभायात्रा

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सुरेश परिहार

नगर के गायत्री माता मंदिर पर चल रही सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के पूर्णाहुति के दिन कथावाचक पंडित श्री केशव जी चतुर्वेदी ने बताया की कथा कभी पूर्ण नहीं होती है उसका केवल विश्राम होता है इसलिए कथा तो लगातार चलती रहती है जितनी कथा करो उतनी कम है हमें भी 7 दिवसीय कथा सुनने एवं सुनाने का मौका मिला है कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया महा आरती महा प्रसादी का भी आयोजन किया गया,पंडित जी ने कहा कृष्ण सुदामा की मित्रता के बारे में सुंदर वर्णन करते हुए बताया की सुदामा बहुत ही गरीब स्थिति में अपना जीवन व्यतीत करते थे इस वजह से वे अपने बच्चों का पेट भर सके इतने भी सुदामा के पास पैसे नहीं थे 1 दिन सुदामा की पत्नी ने कहा हम भले ही भूखे रहे लेकिन बच्चों का पेट तो भरना चाहिए इतना बोलते बोलते उसकी आंखों में आंसू आ गए यह सुनकर सुदामा को बहुत दुख हुआ,लेकिन सुदामा बहुत ही विद्वान व ज्ञानि कृष्ण भक्त था इसलिए उसने कहा कि क्या करें किसी के पास मांगने थोड़े ही जा सकते हैं पत्नी ने सुदामा से कहा आप कई बार कृष्ण की बात करते हो आपकी उनके साथ बहुत गहरी मित्रता है वे तो द्वारका की राजा है वहां क्यों नहीं जाते वहां आप जाइए वहां कुछ भी नहीं मांगना पड़ेगा,सुदामा ने कृष्ण के पास जाने का सोचा सुदामा पूछते पूछते कृष्ण के महल तक पहुंचे सुदामा को पत्नी की बात सही लगी सुदामा ने द्वारका जाने का तय किया पत्नी से कहा ठीक है कृष्ण के पास जाऊंगा किसी के घर मेहमान जाते हैं तो खाली हाथ नहीं जाते हैं वहां पर जाकर कुछ दे सके सुदामा की पत्नी ने भी चावल की पोटली कपड़े में बांध कर दी सुदामा उस पोटली को लेकर द्वारका जाने के लिए निकल पड़े द्वारका देखकर सुदामा तो दंग रह गए पूरी नगरी सोने की थी लोग बहुत सुखी थे सुदामा पूछते पूछते कृष्ण के महल तक पहुंचे द्वारपाल ने साधु जैसे लगने वाले सुदामा से पूछा यहां क्या काम है सुदामा ने जवाब दिया मुझे कृष्ण से मिलना है वह मेरा मित्र है अंदर जाकर कहिए कि आपसे सुदामा मिलने आया है द्वारपाल को सुदामा के वस्त्र देखकर हंसी आई उसने जाकर कृष्ण को बताया आपसे कोई सुदामा मिलने आया है सुदामा का नाम सुनकर कृष्ण खड़े हो गए और सुदामा से मिलने दौड़े सभी आश्चर्य से देख रहे थे कहां राजा और कहां यह साधु ऋषि के गुरुकुल के दिनों की याद ताजा करते हुए कृष्ण सुदामा को महल में ले गए सांदीपनि ऋषि गुरुकुल के दिनों की याद ताजा हो गई सुदामा कृष्ण की स्मृति देखकर शर्मा गए सोने की थाली में अच्छा भोजन परोसा यह सब देख कर सुदामा का दिल भर आया उन्हें लगा कि घर पर बच्चों को पूरा पेट भर कर खाना भी नहीं मिलता है सुदामा चावल की पोटली छुपाने लग गए लेकिन कृष्ण ने खींच लि कृष्ण ने उसमें से चावल निकाले और खाते हुए बोले ऐसा अमृत जैसा स्वाद मुझे और किसी में नहीं मिला सुदामा वहां दो दिन रहे वे कृष्ण से कुछ नहीं मांग सके तीसरे दिन वापिस घर जाने के लिए निकले कृष्ण सुदामा के गले लगे और थोड़ी दूर तक छोड़ने गए,सुदामा को मन में विचार आया घर पर पत्नी पूछेगी कि क्या लाए हो तो क्या जवाब दूंगा लेकिन भगवान को अपने भक्तों की परिस्थिति की पूरी जानकारी होती है और सुदामा के घर पहुंचने से पहले ही भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा की दरिद्रता खत्म कर दी और झोपड़ी की जगह एक बड़ा महल बनवा दिया वह पूरे राजसी ठाट बाट तैयार कर दिया था घर जाकर सुदामा यह सब देख कर आश्चर्यचकित हो गए आज भी अगर हम सच्चे मन से भगवान की भक्ति करते हैं तो भगवान हमें हमारी जरूरत बिना कहे पूर्ण करते हैं पंडित श्री केशव चतुर्वेदी ने बताया इस सच्चा प्रेम मैं आज भी ऊंच नीच या जाती अमीरी गरीबी नहीं देखी जाती है इसलिए इतने युगो बाद भी दुनिया कृष्ण सुदामा की दोस्ती को सच्चे मित्र के प्रतीक के रूप में याद करती है,श्रीमद् भागवत कथा पूर्ण होने पर भागवत जी एवं पंडित जी को ढोल के साथ पूरे नगर में नगर भ्रमण करवाया गया

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