गुरू का आर्शीवाद लेने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते :- आचार्य डॉ. देवेंद्र शास्त्री

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परिवेश पटेल

गुरु पूर्णिमा पर भक्त अपने गुरुओं को उपहार देते हैं और उनका आर्शीवाद लेते हैं। जिन लोगों के गुरु अब इस दुनिया में नहीं रहे वे लोग भी गुरुओं की चरण पादुका का पूजन करते हैं। माना जाता है कि इस दिन गुरुओं का आर्शीवाद लेने से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। शास्त्रों में गुरु को परम पूजनीय माना गया है।ग्राम बनी में अंचल का प्रसीद्ध धार्मिक और आध्यात्मिक स्थल श्री हरिहर आश्रम व कामधेनु गौशाला में गुरुपूर्णिमा का आयोजन किया गया। सुबह आश्रम परिसर में साफ सफाई के बाद श्री हरिहर मंदिर को भव्य रूप से माला फूल से सजाया गया। आश्रम के संस्थापक आचार्य डॉ. देवेंद्र शास्त्री ने श्री यंत्र पूजन एवं हरिहर यज्ञ के बाद का कल्याण वृष्टि का पाठ वैदिक विद्वानों द्वारा किया गया। गुरुपूर्णिमा प्रवचन , आरती के बाद प्रसाद वितरित किया गया। दोपहर में बड़ी संख्या में महिला, पुरुष और बच्चों ने भंडारा में प्रसाद ग्रहण किया।

गुरुपूर्णिमा पर गुरु की महत्ता के बारे में बताया

गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर आचार्य डॉ. देवेंद्र शास्त्री ने श्रद्धालुओ को गुरु की महत्ता के बारे में कहा कि भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से ही गुरु को आदर-सम्मान देने की परंपरा रही है। गुरु को हमेशा से ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूज्य माना जाता है।
‘आचार्य देवोभव:” का स्पष्ट अनुदेश भारत की पुनीत परंपरा है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में गुरु को भी भगवान की तरह सम्मानजनक स्थान दिया गया है। गुरु के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को यह विशेष पर्व मनाया जाता है। गुरु अपने आपमें पूर्ण होते हैं। अत: पूर्णिमा को उनकी पूजा का विधान स्वाभाविक है।

गुरु की शरण ही पथ प्रदर्शक
आचार्य गुरुदेव श्री शास्त्री ने कहा कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी होती है। ऐसी मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के बाद सभी देवी-देवता चार मास के लिए सो जाते हैं। इसलिए देवशयनी एकादशी के बाद पथ प्रदर्शक गुरु की शरण में जाना आवश्यक हो जाता है। परमात्मा की ओर संकेत करने वाले गुरु ही होते हैं। इसीलिए गुरु की छत्रछाया से निकले कपिल, कणाद, गौतम, पाणिनी जैसे विद्वान ऋषि आदि अपनी विद्या वैभव के लिए आज भी संसार में प्रसिद्ध हैं। गुरुओं के शांत पवित्र आश्रम में बैठकर अध्ययन करने वाले शिष्यों की बुद्धि भी वहां के वातावरण के अनुकूल उज्जवल और उदात्त हुआ करती थी। तब सादा जीवन, उच्च विचार गुरुजनों का मूल मंत्र था। तप और त्याग ही उनका पवित्र ध्येय था। लोकहित के लिए अपने जीवन का बलिदान कर देना ही उनकी शिक्षा का आदर्श होता था। इस अवसर पर समस्त विधा साधके परिवार एव श्री नारायण भक्ति संघ का विशेष सहयोग रहा।

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