*निजी स्कूल नहीं कर रहे नियमों का पालन*…. *निजी स्कूलों के संचालकों द्वारा नियमों को ताक में रखकर स्कूलों का संचालन किया जा रहा है*

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*अलीराजपुर से मोहम्मद जोबटवाला की रिपोर्ट* 📲8962423252
अलीराजपुर जिले मे संचालित ज्यादातर निजी स्कूलों में निर्धारित मापदंडों का अभाव है। यहां तक कि बुनियादी सुविधाएं भी निजी स्कूलों में उपलब्ध नहीं कराई जा रही हैं। इन स्कूलों का निरीक्षण तो प्रतिवर्ष उप अधिकारियों के द्वारा की जाती है, इसके बाद भी निर्धारित मूलभूत मापदंडों के बिना निजी स्कूलों का संचालन शिक्षा विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हैं।
उल्लेखनीय है कि निजी स्कूलों के संचालन के लिए शिक्षा विभाग से मान्यता लेनी पड़ती है। इसके लिए मानक निर्धारित किए गए हैं, जिनका पालन मान्यता प्राप्ति के पूर्व ही सुनिश्चित करना होता है। इन मानकों में स्कूल के संचालन के लिए पर्याप्त रूप से भवन की उपलब्धता के अलावा अन्य जरुरी अधोसंरचना का होना भी अतिआवश्यक है। लेकिन अलीराजपुर मे संचालित कई स्कूल किराए के ऐसे मकानों में चल रहे हैं जहां आवश्यक सुविधाओं की नितांत कमी है। नए शिक्षण सत्र से पूर्व मान्यता के नवीनीकरण के क्रम में निरीक्षण दलों के सामने कई खामियां उजागर हुई हैं। मिली जानकारी के अनुसार निरीक्षण के दौरान कई स्कूल ऐसे पाए गए हैं, जहां मूलभूत सुविधाएं भी विद्यार्थियों को नहीं मिल पा रही हैं। इनमें कई स्कूल वर्षों से संचालित हैं और आज भी किराए के कच्चे मकानों में चल रहे हैं। जबकि नियमों के अनुसार निर्धारित समयावधि के पश्चात्‌ स्कूलों का अपना भवन होना अनिवार्य है। वहीं कई स्कूल ऐसे भी हैं जो किराए के भवन मे निजी स्कूलों का संचालन किया जा रहा है। किराए के मकानों में चल रहे निजी स्कूलों में न तो प्रसाधन की सुविधा है और नही बैठने की समुचित व्यवस्था। एक ही कमरे में कई कक्षाएं लगाई जाती हैं। जानकारी के अनुसार सहशिक्षा वाले स्कूलों में छात्रों और छात्राओं के लिए अलग-अलग प्रसाधनों की व्यवस्था अनिवार्य रूप से की जानी चाहिए। लेकिन अलग-अलग तो दूर कई स्कूलों में तो एक भी प्रसाधन नहीं है, वहीं कई स्कूलों में प्रसाधन हैं भी तो वे कचरे और गंदगी से अटे पड़े हैं, जिनकी कभी सफाई नहीं की जाती। इसकी वजह से इनका इस्तेमाल भी नहीं हो पाता। ऐसे में विद्यार्थियों खासतौर पर छात्राओं को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि इन स्कूलों में पीने के पानी की भी समुचित व्यवस्था नहीं है और इसके लिए भी विद्यार्थियों को भटकना पड़ता है। 
*खेल मैदान भी नही है*
विद्यार्थियों के समुचित शारीरिक विकास के लिए स्कूलों में खेल मैदान का होना अनिवार्य है। यहां तक कि शासकीय स्कूलों में भी इस पर जोर दिया जा रहा है, लेकिन वर्षों से चल रहे स्कूलों में आज भी खेल मैदान उपलब्ध नहीं हैं। गौरतलब है कि निजी स्कूल विद्यार्थियों से मनमानी फीस वसूलते हैं। जिनमें भवन निर्माण से लेकर अलग-अलग सुविधाओं के नाम पर यहा तक की लेट फीस भी 100 रु ली जाती साथ ही खेल  फीस, परिक्षा फीस, एनिवल फमसन, करे तो भी बच्चो से ही फिस वसूलते है और मोटी रकम इकठ्ठा कर लेते है। बावजूद निजी स्कूलों द्वारा अनिवार्य अधोसंरचना के विकास पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
*निजी स्कूलों के निरीक्षण में अप्रशिक्षित शिक्षकों से भी अध्यापन कार्य कराए जाने की बातें सामने आई हैं।* 
जानकारी के अनुसार प्राथमिक स्तर के स्कूलों में नियुक्ति की न्यूनतम सीमा बारहवीं उत्तीर्ण होना है, वहीं उच्च कक्षाओं के लिए स्नातक व स्नातकोत्तर होने के साथ ही बीएड अथवा डीएड की परीक्षा उत्तीर्ण होना आवश्यक है, लेकिन नियमों को अनदेखी करते हुए कहीं आठवीं तो कहीं दसवीं पास लोगों से ही यह अध्यापन कार्य कराया जा रहा है। जिले के निजी स्कूलों में अप्रशिक्षित शिक्षकों से अध्यापन कार्य कराना एक बड़ी समस्या साबित हो रही है। इस बात से जिले के शिक्षा विभाग का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
*स्कूलों में खुलती दुकानें*
निजी स्कूल चलाना अब एक व्यवसाय बन गया है। मनमानी फीस वसूलने के बाद अब ज्यादातर निजी स्कूलों में सामग्र्रियों की बिक्री को भी तरजीह दी जाने लगी है। स्कूलों में ही दुकानें खोल कर बच्चों को पुस्तक से लेकर यूनिफॉर्म तक की बिक्री की जाती है। कमाई के लिए स्कूलों द्वारा मनमाना पाठ्यक्रम लागू कर दिया जाता है, वहीं बच्चों को पुस्तकों के साथ ही कापियां तक स्कूल से ही खरीदने पर मजबूर किया जाता है।  स्कूलों में दुकानों के संचालन पर रोक लगाने के निर्देश जारी किए गए थे, लेकिन इसके बावजूद कई स्कूलों द्वारा परिसर में ही दुकान खोलकर कापी-पुस्तकों के साथ ही अन्य सामग्रियां बेची जा रही हैं।
*वाहन संचालन में भी अनियमितता*
विद्यार्थियों को स्कूलों तक लाने-ले जाने वाले वाहनों के संचालन में भी निजी स्कूल मनमानी करते हैं। शासन के निर्देशों के अनुसार स्कूली वाहनों के चालकों को समुचित लाइसेंस के साथ ही पर्याप्त अनुभव होना भी जरुरी है, वहीं बच्चों को स्कूल लाने ले जाने का कार्य एक शिक्षक की देख-रेख में संपादित किया जाना चाहिए। पूर्व मे कलेक्टर  द्वारा निजी स्कूलों को उक्ताशय के निर्देश भी जारी किए थे। लेकिन स्कूलों द्वारा नियमों की अनदेखी करते हुए नौसिखिए लोगों को बतौर चालक नियुक्त कर दिया जाता है। वहीं कई स्कूली वाहन आज भी बिना नंबर प्लेट के अवैध रूप से चल रहे हैं। जबकि स्कूली वाहनों को पीले रंग में होने के साथ ही इन पर आगे और पीछे दोनों ओर की नंबर प्लेटों पर नंबर अंकित होने चाहिए। दूसरी ओर वाहन सुविधा के नाम पर मनमाना शुल्क वसूलने के साथ ही स्कूलों द्वारा अभिभावकों से वर्ष भर का वाहन शुल्क ले लिया जाता है।
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