वाह चंदू लाला…! जिनके बल पर राजनिती कर रहे है उन्हे ही तुच्छ समझ रहे हो…? आदिवासी अब ना समझ नही रहा पढ लिख गया है…?

2016

वाॅइस ऑफ झाबुआ

चुनाव आते ही नेताओं के सर मतदाताओं के सामने नतमस्तक हो जाते है… और पिछवाडा भी धोने तैयार हो जाते है… मगर चुनाव जीतने के बाद उन्ही मतदाताओं को नेता भुल जाते है… झाबुआ जैसे आदिवासी जिले में आज भी जातिवाद का दंश फैला हुआ है… यहां आज भी आदिवासियों को तुच समझा जाता है… सुना है ऐसा ही कुछ 20 सालों से आदिवासियों ने नाम पर रोटी सेक अपने बच्चे पाल रहे चंदुलाला करते है… जिनके घर के दिये भी आदिवासियों के नाम पर कमाये रूपयों से जलते है। आज भी वो किसी आदिवासी के घर पहुंचते है तो उनके घरों का पानी तक नही पीते है… जातपात के नाम पर आज भी अगर कोई आदिवासी इनके घर पहुंचता है तो उन्हे बाहर ही बैठाया जाता है… पिछले 20 वर्षो से आदिवासियों के नाम पर मिलने वाली करोडों की राशि में चंदुलाला ने कई गोलमाल किए जो हम आस पास के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास कार्यो को देख कर कह सकते है।
मगर चंदु लाला अब ये भुल गए है कि अब आदिवासी भी पढ लिख गया है उसे सही गलत का फैसला खुद करते आता है और वो जानता है कि अब हमें जातपात करने वालों से दुरियां बनाना ही बेहतर होगा… जिसका असर इस बार चुनाव में देखने को आसानी से मिलेगा… जो चंदुलाला की सारी भ्रांतियां दुर हो जायेगा….।
और इस बार चंदुलाला को डर तो है तभी तो वो अपने घर से बाहर निकले है… निकलेंगे भी क्यों न अब आदिवासियों के उत्थान के लिए कई सामाजिक संगठन भी आगे है जो उन्हे सही गलत का फैसला करने में सहायता करते है। बडी बात तो ये है की कुछ समय बाद ही चंदु लाला के काले चिट्ठे उजागर होने वाले है… जिससे लोगों को पता चलेगा कि कैसे आदिवासियों के नाम पर इनकी दरबारी चल रही थी और इनके बच्चें पल रहे है थे… चंदुलाला को भी हिदायत है अब राजा भी चले गए और रजवाडे भी बिक गए… अब अपनी हुकुमगिरी बंद करों…. कहीं हुकुमगिरी के चक्कर में पटखनी न खानी पड जाये… इंसान को इंसान समझों… नी समझोगे तो… जल्द ही सारी हेकडी निकल जायेगी… समय दुर नही जब काले चिट्ठे की एक एक कारिस्तानी उजागर होगी… और मुंह काला होगा… जो आदिवासियों के नाम पर कमाया वो एक एक कर वसुला भी जायेगा।

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