विश्व को अहिंसा का सन्देश देने वालें प्रभु महावीर का जन्मकल्याणक महोत्सव मनाया

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वर्तमान समय में प्रासंगिक सकल विश्व में अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रम्हश्चर्य व अपरिग्रह जैसे नैतिक मूल्यों का उपदेश प्रदान करने वाले जैन समुदाय के परम आराध्य चरम तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म कल्याणक महोत्सव चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को पूरे देश में बड़े ही हर्ष उल्लास के साथ मनाया गया वही जैनाचार्य पूज्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. “अणु” की दीक्षा जयंती भी मनाई। जैन समाज ने अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रखते हुए प्रातः काल श्वेताम्बर, दिगम्बर व तेरापंथ समाज ने त्रिशला नन्दन वीर की – जय बोलो महावीर की, प्रभु महावीर का दिव्य सन्देश – जियो और जीने दो जैसे गगन भेदी जयकारों के साथ सामूहिक जुलूस में शामिल हुए। जिसमें बड़ी संख्या में पारंपरिक परिधानों में महिला, पुरुष व बच्चों ने उत्साहपूर्वक हिस्सा लिया।
जैन समाज की प्रभात फेरी सकल विश्व को प्रभु महावीर के जियो और जीने दो के साथ ही प्रेम, मैत्री और सहिष्णुता का सन्देश देते नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए जिनालयों के दर्शन करते हुए जैन स्थानक भवन पहुँची जहाँ विराजित तत्वज्ञ पूज्य श्री धर्मेन्द्रमुनिजी एवं निखिलशीलाजी म.सा. आदि ठाणा – 9 के सानिध्य में महावीर प्रभु के जीवन के रोचक कथानक सुनाए व जैनाचार्य पूज्य श्री उमेशमुनिजी म.सा. “अणु” की दीक्षा जयंती पर गुरु की महिमा वर्णित की। उपस्थित धर्म परिषद को सम्बोधित करते हुए तत्वज्ञ श्री ने कहा कि सामान्य पुरुषों का जन्मदिवस मनाया जाता है परंतु स्व पर का कल्याण करने वालें तीर्थंकर प्रभु का जन्म कल्याणक मनाया जाता है। आजके दिन की सार्थकता बताते हुए तत्वज्ञ श्री ने कहा कि आज वीर प्रभु का जन्म कल्याणक, आचार्यश्री की 67वीं दीक्षा जयंती एवं नव पद ओलिजी में दर्शन की आराधना का दिन होने से धर्म का प्रतिपादन भी तीनों प्रसंगों को देखते हुए किया जा रहा है। उन्होंनें कहा कि उदात्त भाव आने से जीव का विकास प्रारम्भ हो जाता है भगवान महावीर स्वामी का जीव भी अनादि काल से हमारें साथ ही था परंतु नयसार के भव में अतिथि को दान देने के उदात्त भाव से उनका संसार सीमित हो गया। भगवान के भव परम्परा का चिंतन करते हुए उन्होनें भगवान महावीर के भव में उनके द्वारा की गई सम्यग आराधना का स्वरूप बताया। पूज्यश्री ने कहा कि आत्म साधक लौकिक भविष्य की चिंता करने के बजाय सम्यक आराधना को महत्व देता है। उन्होनें वर्तमान समय को व्यवहारिक बताते हुए भव्य जनों को सावधान रहने का संकेत भी दिया। इस अवसर पर धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए मधुर व्याख्यानी पूज्य श्री गिरिशमुनिजी ने कहा कि आराधना के भव ही सार्थक होते है नयसार के भव से पहले भी भगवान का जीव संसार में अशुद्ध अवस्था में था फिर आराधना करते हुए वह शुद्ध स्वरूप को प्राप्त होकर स्व-पर कल्याणकारी बना। उन्होनें परिषद को कर्म बोध करवाते हुए कहा कि जीव कर्म के फल से जितना डरता है उतना ही पाप कर्म बन्ध से डरने लगे जाए तो कर्म निरोध की इच्छा होती है। भगवान ने भी जन्म लेकर जन्म मरण को मिटाने की साधना की जिससे वे हमारें पूजनीय व वंदनीय बने। मधुर व्यख्यानी ने स्तवन के माध्यम से घर के त्याग को सार रूप बताते हुए सांसारिक तुच्छ वस्तुओं की अपेक्षा भगवान की भौतिक सम्पन्नताओं से तुलना करते हुए उसे त्यागने का फल बताया। धर्मसभा में साध्वी निखिलशिलाजी एवं दीप्तिश्रीजी ने गगन गुजा दो भक्ति से गुरु का करो जयकारा स्तवन के माध्यम से भगवान एवं गुरुदेव के जीवन की साधना का महत्व बताया इस अवसर पर उन्होंनें उपस्थित परिषद को व्यसन के त्याग कर जन्म कल्याणक पर अपने जीवन को सार्थक बनाने की प्रेरणा दी। इस अवसर पर स्थानकवासी जैन श्रीसंघ के अध्यक्ष जितेंद्र घोड़ावत, दिगम्बर समाज के बाबूलाल भिमावत आदि ने सभी को प्रभु महावीर जन्मकल्याणक, जैनाचार्य उमेशमुनिजी “अणु” की 67वीं व पूज्याश्री दीप्तिश्रीजी की 12वीं दीक्षा जयंती की शुभ कामनाएँ दी। सभा का संचालन संघ सचिव प्रदीप गादिया ने किया।

धर्मसभा व चल समारोह में संघ के वरिष्ठजन नगीनलाल शाहजी, प्रकाशचंद्र घोड़ावत, माणकलाल लोढा, अरुण कोठारी, अरविंद रुनवाल, कमलेश दायजी, रमणलाल मुथा, रमेशचंद्र शाहजी, अनिल भंसाली, मयूर तलेरा, नरेंद्र काकू श्रीमाल, रमेशचन्द्र श्रीमाल, दिलीप शाह, कनकमल घोड़ावत, यतीश छिपानी, उमेश पिचा, चंचल भंडारी, रूपेश पोरवाल, बुद्धिलाल मिंडा, अभय मेहता, इन्द्रवर्धन मेहता, महावीर मेहता, अनिल लुणावत, महेश व्होरा, प्रदीप जैन, अभय रुनवाल, रतनलाल जैन, रवि लोढ़ा, संदीप शाहजी, अखिलेश श्रीमाल, हितेश शाहजी, अरूण गादिया, विजय भिमावत, सुधा शाहजी, इंदु कुवाड़, अनुपमा श्रीमाल, शकुंतला कांकरिया, सानिया तलेरा, संध्या भंसाली, किरण श्रीमाल, प्रिया तलेरा, स्वीटी गादिया सहित सकल जैन श्रीसंघ उपस्थित था।

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