पटेल बंधु की राजनिती हो सकती है खत्म…!

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वॉइस ऑफ झाबुआ

महेश पटेल व उनके परिवार का राजनैतिक इतिहास बडा पुराना है… और हमेशा देखा गया है खुद की गलतियां को ये दुसरों पर ही हमेशा से मढते आ रहे हैं…. पिता की राजनिति के समय भी दिग्गविजय सिंह से भी एक बडा विवाद हुआ था… शिक्षा के इस दौर में अब लोग समझदार हो चुके है क्या सही है और क्या गलत वो खुद ही फैसला कर लेते है और महेश पटेल के राजनैतिक इतिहास में वो 4 बार विधायक का चुनाव लड चुके है मगर एक बार भी जीत का सेहरा नही बांध सके। इससे ऐसा लगता है कि महेश पटेल को अपने ही क्षेत्र में लोगों के बीच जाकर अपने संबंध सुधारने व जनता के विकास की ओर ध्यान देखना चाहिए।

सुत्रों का कहना है स्वर्गीय कलावती भूरिया के देहांत के बाद जोबट विधानसभा में विधायक की सीट खाली होने पर उपचुनाव हुआ। जहां जनता ने महेश पटेल पर विश्वास न जताते हुए सुलाचना रावत जो कि काग्रेंस छोड भाजपा में शामिल हुई फिर भी उसे दिल खोलकर वोट देकर जीत का सेहरा बंधवाना कहीं न कही महेश पटेल को अलीराजपुर की जनता नकार रही है। अब ऐसे में महेश पटेल की हार में कांतिलाल भूरिया का क्या दोष जो महेश पटेल बार बार उन पर दोष लगा रहे है। शिक्षा के दौर में आज का युवा बदल चुका है और वो सब समझने लगा है उन्हे लगा क्या सही है और क्या गलत उसी हिसाब से फैसला हुआ… भूरिया ने तो घर घर जाकर नही कहा कि महेश को वोट मत दो… ये तो जनता के विवेक की बात है उन्हे किसे वोट देना है और किसे नही।
सुत्रों का तो यह भी कहना है कि भगोरिये से लौट रहे कांतिलाल भूरिया व विक्रांत भूरिया और उनके काफिले पर जो हमला हुआ वो सोची समझी साजिश थी। वायरल हुए विडियों में साफ नजर आ रहा है कि महेश पटेल का बेटा किस तरह से बीच बाजार में विवाद कर रहा है और वीडियों में महेश पटेल खुल दगडे (पत्थर) मारो कहते नजर आ रहे है। वीडियों को देख ऐसा लगता है कि भूरिया के खिलाफ ये सोची समझी साजिश थी।

खुलेआम भूरिया के काफिले पर 10 से 12 लोगों ने पत्थराव किया और कार्यकर्ताओं द्वारा जब इन बदमाशों का पीछा किया तो एक काली गाडी में जाकर बैठ गया उसे भूरिया समर्थकों ने पकड लिया। अब बात ये हो गई चोरी उपर से सीना जोरी मतलब साफ है काफीले पर पत्थर मारने वालें के पक्ष में महेश पटेल ने पहले ही जाकर अपहरण का मामला दर्ज करवाया। जबकि बीच बाजार में जनता सब कुछ देख रही थी। पुलिस ने भी बिना जांचे परखे मामला दर्ज कर लिया।

अभी भी समय है पटेल बंधुओं के लिए कि वो अपनी हार का सेहरा दुसरों पर बांधने की बजाय खुद को टटोले… जिस तरह से महेश पटेल का बेटा बाजार में आतंक मचा रहा था उससे तो ऐसा लगता है कि जनता और भय में हो गई है और ऐसे में पटेल बंधु चुनाव लडते है तो भय के मारे जनता फिर वोट नही देगी।

जनचर्चा तो यह है कि अब पटेल बंधु यानी महेश पटेल मुकेश पटेल की राजनिती यहीं खत्म होती नजर आ रही है। महेश के इन कारनामों की वजह से मुकेश की राजनिती को भी नुकसान हो सकता है और आने वाले समय में जनता दोनों भाईयों को पुरी तरह से नकार सकती है। विवादों से बच इन्हे जनता के बीच जाना होगा… मगर ऐसे हमले होते रहेंगे तो ये जनता के बीच भी नही जा पायेंगे।
बडी बात तो यह है कि पुलिस को दोनों पक्षों की बात सुनकर ही मामला दर्ज करना चाहिए था मगर पुलिस ने भी ऐसा नही किया। अखबारों में एसडीओपी साहब के बयान आये है कि पहले महेश पटेल की शिकायत हुए मगर कांतिलाल भूरिया भी झाबुआ के विधायक है उन्होने एक बार भी ये देखने की कोशिश नही कि दोनों पक्षों का मत लिया जाये जांच हो फिर मामला दर्ज हो। मगर ऐसा क्यों नही किया ये समझ से परे है और इस कार्रवाई से पुलिस पर भी कई सवालिया निशान खडे हो रहे है।

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